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कठिन क्षेत्र में कार्यकाल पूरा करने वाले कर्मचारियों के तबादले पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

कठिन या जनजातीय क्षेत्र में कार्यकाल पूरा होने पर कर्मचारी का तबादला सरकार की जिम्मेदारी
हाईकोर्ट ने कहा—समय पर ट्रांसफर न हुआ तो पोस्टिंग सजा जैसी लगेगी
शिक्षक की याचिका पर आदेश रद्द, चार सप्ताह में स्थानांतरण के निर्देश


शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कठिन और जनजातीय क्षेत्रों में तैनात कर्मचारियों के स्थानांतरण को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने साफ कहा है कि यदि कोई कर्मचारी अपने निर्धारित कार्यकाल को पूरा कर लेता है, तो उसे वहां से स्थानांतरित करना सरकार और संबंधित विभाग की जिम्मेदारी है। यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो इन क्षेत्रों में की जाने वाली नियुक्तियां कर्मचारियों के लिए सजा जैसी पोस्टिंग बनकर रह जाएंगी।

न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि कर्मचारियों को यह भरोसा नहीं होगा कि कठिन क्षेत्र में तय अवधि पूरी होने के बाद उनका तबादला कर दिया जाएगा, तो भविष्य में कोई भी कर्मचारी ऐसे क्षेत्रों में स्वेच्छा से सेवा देने के लिए तैयार नहीं होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि कठिन क्षेत्रों में सेवा देने वाले शिक्षकों और कर्मचारियों का स्थानांतरण उनका अधिकार है, न कि सजा।

अदालत ने 31 जनवरी 2026 को जारी उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता शिक्षक के स्थानांतरण के अनुरोध को खारिज कर दिया गया था। कोर्ट ने शिक्षा विभाग और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि चार सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता का वर्तमान स्थान से स्थानांतरण कर उन्हें किसी अन्य क्षेत्र में तैनात किया जाए और उनकी जगह किसी नए कर्मचारी की नियुक्ति की जाए।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि शिक्षक का तबादला इसलिए नहीं किया गया, क्योंकि इससे उनके बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो सकती थी। हालांकि अदालत ने इस तर्क को मनमाना और असंगत बताते हुए खारिज कर दिया।

याचिकाकर्ता शिक्षक वर्तमान में मंडी जिले के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला कठोग में कार्यरत हैं। उन्होंने अपनी याचिका में बताया कि उन्होंने इस कठिन क्षेत्र में अपना सामान्य कार्यकाल पूरा कर लिया है, लेकिन इसके बावजूद विभाग ने 31 जनवरी 2026 को उनका स्थानांतरण करने से इनकार कर दिया था। इसी आदेश को चुनौती देते हुए उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

इसी मामले के दौरान अदालत ने शारीरिक शिक्षा प्रवक्ताओं (डीपीई) की वरिष्ठता और पदोन्नति से जुड़े विवाद पर भी सख्त रुख अपनाया। अदालत ने शिक्षा विभाग को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता प्रवक्ताओं की वरिष्ठता सूची को अगली सुनवाई में आधिकारिक रिकॉर्ड के रूप में पेश किया जाए। इस मामले की अगली सुनवाई 25 मार्च को निर्धारित की गई है।

उधर, न्यायिक ढांचे से जुड़े एक अन्य मामले में अदालत ने राज्य में न्यायिक नियुक्तियों और सुविधाओं में हो रही देरी पर भी नाराजगी जताई। अदालत ने अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) को अगली सुनवाई में कोर्ट में तलब किया है। खंडपीठ ने पाया कि कई महत्वपूर्ण फैसले अब भी मंत्रिपरिषद स्तर पर लंबित हैं, जिनमें लॉ क्लर्क-कम-रिसर्च असिस्टेंट के 20 पद, सिविल जजों के 34 नए न्यायालय, और कई अन्य प्रशासनिक फैसले शामिल हैं। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 31 मार्च को तय की है।

एक अन्य मामले में हाईकोर्ट ने आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका भी खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि यदि कोई उम्मीदवार चयन प्रक्रिया से संतुष्ट नहीं है, तो उसे नियुक्ति नीति के अनुसार 15 दिनों के भीतर उपायुक्त के पास अपील करनी चाहिए। सीधे रिट याचिका दाखिल करना उचित नहीं है। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि संबंधित आंगनबाड़ी कार्यकर्ता पिछले 12 वर्षों से अधिक समय से सेवा दे रही हैं, इसलिए अब इस नियुक्ति को चुनौती देना उचित नहीं है।